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Mastram Ki Savita मस्तराम की सविता

Mastram Ki Savita मस्तराम की सविता

धीरे-धीरे तीन वर्ष बीत गये, किन्तु सविता की गोद नहीं भरी। इस कारण वह तनाव ग्रस्त रहने लगी। सविता को शक हुआ, कि विनोद में कुछ कमी है, जिसके कारण वह मां नहीं बन सकी। उसने विनोद से इलाज कराने को कहा, तो उसने सविता को डपट दिया। बस यहीं से दोनों के बीच तनाव बढ़ गया। यद्यपि इस बीच सविता ने कई तांत्रिकों की शरण ली, तो उन्होंने भी पति में ही कमी बताई।
कहते हैं कि औरत का शक पत्थर की लकीर होता है। सविता को भी शक होने लगा था, कि उसका पति नपुंसक है, जिससे वह कभी मातृत्व सुख प्राप्त नहीं कर पायेगी। इस कारण घर में कलह होने लगी। कलह बढ़ी, तो विनोद ने शराब पीना शुरू कर दिया।
अब वह दुकान बंद कर पहले शराब के ठेके पर जाता, फिर लड़खड़ातेे कदमों से घर पहंुचता। कभी खाना खाता, कभी बिना खाये ही चारपाई पर लुढ़क जाता। सविता भी नफरत से भरी रहती थी, तो पति की परवाह ही न करती थी। वह तो उसे ठूंठ समझने लगी थी।
इन्हीं दिनों विनोद ने चक्की चलाने के लिये एक नया नौकर रख लिया। उसका नाम मस्तराम गुप्ता था। मस्तराम जगनपुरा में रहता था। उसके पिता रतन गुप्ता साधारण किसान थे।
मस्तराम हाईस्कूल तक पढ़ सका था। उसके बाद रसूलाबाद में चक्की पर काम करने लगा था। वहीं उसने चक्की चलाना सीखा। कुछ साल काम करने के बाद उसने वहां काम छोड दिया और पिता के साथ खेती करने लगा था।
एक रोज उसे मालूम हुआ, कि सहायल कस्बा निवासी विनोद को चक्की चलाने के लिये मिस्त्राी की जरूरत है, तो वह विनोद से मिला। बातचीत व वेतन तय करने के बाद विनोद ने मस्तराम को नौकरी पर रख लिया।
मस्तराम गुप्ता मेहनती था। पिसाई भी अच्छी करता था, अतः साल बीतते वह विनोद का चहेता बन गया। मस्तराम की वजह से उसकी आटा बिक्री भी बढ़ गयी थी। अतः दुकान का सारा भार उसने मस्तराम को ही सौंप दिया था। मस्तराम दिन भर की बिक्री का हिसाब-किताब विनोद को सौंप देता, फिर दुकान बन्द कर अपने घर चला जाता। कस्बा और जगनपुरा के बीच एक किलोमीटर का फासला था।
एक रोज मस्तराम गुप्ता दुकान पर पहंुचा, तो दुकान बन्द थी, जबकि बाजार का दिन था और कई ग्राहक सामान लेने खड़े थे। सोच-विचार में डूबा मस्तराम अपने मालिक विनोद के घर पहंुचा। उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो विनोद ने दरवाजा खोला।

 

मस्तराम को देखकर वह बोला, ‘‘आज मेरी तबियत खराब है। तुम जाकर दुकान ‘‘खोल लो। तबियत हल्की हुयी, तो दोपहर बाद तक आ जाऊंगा।’’
‘‘ठीक है भइया, आप आराम करें।’’ कहकर मस्तराम चाबी लेकर चलने लगा।
तभी विनोद पुनः बोला, ‘‘अरे मस्तराम आये हो, तो चाय नाश्ता कर लो। अभी मैंने भी चाय नहीं पी है।’’ फिर उसने अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘अरे सविता, जरा दो कप चाय और साथ में कुछ नमकीन ले आओ।
सविता मन ही मन बुदबुदाई। फिर कुछ देर बाद चाय और नमकीन लेकर आई। सविता जब झुकर टेª मेज पर रखने लगी, तो मस्तराम उसे ठगा-सा देखता रह गया। वह कभी विनोद को देखता, तो कभी सविता को, जिसके दिलकश चेहरे में गजब का आकर्षण था। वह विनोद से उम्र में भी कम लग रही थी। लगता था जैसे 20.22 साल की शोख हसीना हो। जबकि विनोद उसके सामने कहीं भी नहीं ठहरता था। वह पहली ही नजर में सविता का दीवाना बन गया।
जो हाल मस्तराम का था, वही सविता का। उसने भी हृष्ट-पुष्ट नौजवान मस्तराम को देखा, तो सोचने लगी, कि काश! ऐसा ही मर्द उसकी जिंदगी में होता, तो जीवन खुशहाल बन जाता। ललचायी नजरों से देखती हुयी सविता बैठ गयी और पति से बोली, ‘‘वह कौन है? पहली बार देख रही हूं। कोई खास मेहमान है? कहो तो खाना-वाना बना देती हूं।’’
‘‘अरे नहीं…. नहीं।’’ मुस्करा कर बताया विनोद ने, ‘‘यह मस्तराम है। बड़ा मेहनती है। दुकान पर काम करता है। जब से वह आया है। दुकान अच्छी चलने लगी है। आटा की सप्लाई भी बढ़ गयी है। आज दुकान नहीं पहंुच पाया, तो चाबी लेने घर आ गया।’’
मस्तराम, सविता का दीवाना बन गया था, अतः किसी न किसी बहाने वह सविता के पास पहंुच जाता और उसके रूप सौन्दर्य की तारीफ करता। मस्तराम भूल गया, कि उसका रिश्ता नौकर मालकिन का है। सविता भी मस्तराम की तरफ आकर्षित थी। अतः दोनों में हंसी-मजाक होने लगा। कभी कभी यह हंसी-मजाक सामाजिक मर्यादाओं को भी लांघ जाता था, लेकिन सविता बुरा नहीं मानती थी।

दरअसल मस्तराम को सविता से मिलने दो बार मौका मिलता था। पहला मौका दिन में दो बजे जब उसकी खाना खाने की छुटटी होती थी। दूसरा मौका तब जब विनोद शाम को दुकान बन्द कर ठेका की ओर बढ़ जाता था।
ऐसी ही एक शाम मस्तराम ने सविता को अपने दिल की बात बता दी। सविता ने भी अपनी स्वीकृत दे दी, कि वह भी उसे चाहती है। इतना सुनते ही मस्तराम ने सविता को बांहों में भरकर चूम लिया। धीरे-धीरे सविता ने भी उसकी जांघों पर हाथ रख दिया और उसके शरीर से छेड़छाड़ करने लगी। मस्तराम, सविता की इस हरकत पर हैरान नहीं, बल्कि मन-ही-मन रोमांचित हो रहा था। वह समझ गया था, कि आज उसकी हसरत, जो उसने ना जाने कब से अपने सीने में छिपा कर रखी हुई थी, आज पूरी होने वाली है।

 

सविता द्वारा की जा रही छेड़छाड़ से मस्तराम भी उत्तेजित होने लगा था। वह धीरे-से बोला, ‘‘भाभी, आप चाह क्या रही हैं, कहीं आप बिस्तर का मजा…।’’
‘‘चुप नादान देवर।’’ एक मादक सिसकी लेते हुए सविता ने मस्तराम के होंठों पर अंगुलि रख दी, ‘‘जब सब समझ रहे हो, तो निठल्लों की तरह क्या बैठे हो?’’ वह उसकी आंखों में झांकते हुए बोली, ‘‘आओ न, दरवाजा बंद है और बिस्तर खाली है।’’ वह शिकायती भरे स्वर में बोली, ‘‘ऐसे में तड़पा क्यों रहे हो? जल्दी से मेरे और अपने वस्त्रा निकाल फेंको इन तपते जिस्मों से।’’
अब तो सविता के कामुक रूपी शब्दों के तीरों ने मस्तराम को घायल करके रख दिया। वह वासना की आग में तिल-तिल जलने लगा। उसने झट से सविता को बांहों में भींच लिया और बिस्तर पर लेटा दिया। फिर उसके ऊपर झुक कर उसके गुलाबी होंठों का रसपान करते हुए उसके गोरे, उन्नत उभारों को दीवानों की तरह मसलने लगा
‘‘वाह! मेरे राजा।’’ सविता ने भी कस कर मस्तराम के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘आज तो मेरे बदन की एक-एक हड्डी को चटखा कर रख देना।’’ फिर वस्त्रों के ऊपर ही वह मस्तराम के ‘हथियार’ को टटोलते हुए बोली, ‘‘इतनी देर से खामखां बेवकूफ बना रहे थे।’’ वह मुस्करा कर बोली, ‘‘तुम्हारा ‘जिस्म’ तो बहुत सख्त हो रहा है।’’ वह मसखरी करते हुए बोली, ‘‘लगता है, तुम्हारी निगाहें पहले से ही मेरे गोरे नाजुक जिस्म पर लार टपका रही थीं।’’

‘‘सही ताड़ा, तुमने मेरी जान।’’ अब मस्तराम भी उसे पूरी तरह खुल गया, ‘‘मैं तो तुम्हें ना जाने कब से अपने नीचे पीसने के लिए मचल रहा था। जब भी तुम्हें देखता, तो बस यही सोचता था, कि काश! कब ये जिस्म मेरे नीचे होगा, ताकि मैं अपने जिस्म की हर हसरत को तुम्हें रौंद कर पूरा कर सकूं।’’
‘‘ओहो!’’ मुस्करा कर बोली सविता, ‘‘तो जनाब छुपे रूस्तम निकले।’’ सविता ने मस्ती में उसके वस्त्रों के ऊपर ही उसके खास ‘जिस्म’ को छेड़ते हुए कहा, ‘‘तो अपना ये ‘जिस्म’ ना कब से मेरी ‘देह’ में मन-ही-मन महसूस रहे थे।’’ फिर एक मादक अंगड़ाइे लेते हुए बोली, ‘‘तो फिर आज मन की हसरत पूरी कर लो। मैं तो तुम्हें नहीं रोकूंगी।’’
फिर सविता उसके कान में फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘अब इन बैरी वस्त्रों को अपने तन से जुदा करो न।’’ फिर मुस्करा पड़ी, ‘‘तब तक मैं भी अपने वस्त्र…।’’ और फिर शरमा गयी सविता।
फिर देखते ही देखते दोनों ने अपने सभी वस्त्र अपने तन से जुदा कर डाले और बिस्तर पर एक ओर फंेक दिए। सविता ने जब मस्तराम के जवां, गठीले ‘बदन’ को देखा, तो वह मन-ही-मन रोमांचित हो उठी। उसे लगा आज तो शामत नहीं मेरी ‘देह’ की।
फिर सोचने लगी, कि मजा भी तो इसी में है, कि बिस्तर पर संसर्ग के दौरान पाटर्नर का मजबूत ‘बदन’ उसकी ‘देह’ में समा कर उसकी गहराई को नापते हुए पूर्णतः तृप्त कर डाले।
फिर तो दोनों बिस्तर पर आदमजात अवस्था में एक-दूसरे जिस्म के अंगों को नांेचने-खसोटने लगे। कभी सविता उसके खास ‘अंग’ को पकड़ कर झटका देती, तो कभी मस्तराम उसके अंगों को जोरों से मसलने लगता। इस उठा-पटक में दोनों काफी देर तक लीन रहे और फिर कुछ ही देर में दोनों एक जोरदार मादक सिसकी लेते हुए बिस्तर पर चित्त पड़ गए। दोनों ही पूर्णतः संतुष्ट हो गए थे।
जिस प्रकार से मस्तराम ने सविता को भोगा था, सविता उसके जोश, प्यार करने के अंदाज व उसके सख्त व मजबूत ‘बदन’ के नीचे पिसकर खुद को गर्वित महसूस कर रही थी। उसे अपना पति विनोद, मस्तराम के आगे एकदम नपुंसक महसूस हो रहा था।
इसके बाद सविता के लिए मस्तराम ही सब कुछ हो गया। उसने पति को दिल से निकाल दिया और उसकी जगह मस्तराम को दिल में बसा लिया। सविता, मस्तराम का ज्यादा सानिध्य पाना चाहती थी, इसलिए उसने एक उपाय खोजा।

सविता ने एक दिन पति से कहा, ‘‘आप दुकान दूकान बन्द करने के बाद पैसे मस्तराम के हाथ घर भिजवा दिया करें। क्योंकि आपको तो पीने की लत है, किसी ने पैसे मांग लिये या झगडा हो गया, तो नुकसान हो जायेगा।’’
सविता की यह बात विनोद ने मान ली। इस तरह सविता और मस्तराम का रिश्ता और भी प्रगाढ़ हो गया।
सविता से मिलन की भूख मिटाने के लिए कभी-कभी मस्तराम रात में विनोद के घर छुपकर बैठ जाता। जब विनोद देर रात नशे में धुत्त होकर घर आता और चारपाई पर पसर कर खर्राटे भरने लगता, तो सविता तथा मस्तराम की रंगीन रातों का सफर शुरू हो जाता। फिर सवेरा होने से पहले मस्तराम चला जाता।
कहते हैं, कि अवैध संबंधों का भान्डा किसी न किसी दिन फूट ही जाता है। ऐसा ही मस्तराम और सविता के साथ भी हुआ। उस रोज शाम को दूकान बन्द कर विनोद घर पहुंचा और पत्नी से बोला, ‘‘सविता मंै झीझक कस्बा अपने दोस्त के घर जा रहा हूं। उसके भाई का तिलक है। रात में घर नहीं लौट पाऊंगा। तुम होशियारी से रहना।’’
यह सूचना सविता के लिए काफी संतोष जनक थी। विनोद घर से चला गया, तो सविता ने मस्तराम से मोबाइल पर बात की और तुरन्त घर आने को कहा। मस्तराम यघपि घर पहंुच गया था, लेकिन सविता के प्यार का दीवाना मस्तराम बहाना बनाकर घर से चल पडा।
कुछ ही देर बाद वह सविता के घर पहुंच गया। मस्तराम के पहंुचते ही सविता चिहुंक उठी और बोली, ‘‘आज रात तो मौजा ही मौजा है। तुम्हारे मालिक झीझक गये हैं। कल ही आ पायेंगे।’’
कहते हुए सविता ने अपनी बाहों का हार मस्तराम के गले में डाल दिया। फिर दोनांे कमरे के अंदर कैद हो गये।
सुबह करीब चार बजे विनोद लौट आया। मनेाज ने कमरे का दरवाजा खटखटाया सविता को आवाज दी। लगभग पांच मिनट बाद सविता ने दरवाजा खोला और उसके दोनों पल्ले को पकड़ कर खडी हो गयी, ‘‘अरे आप!’’ वह बोली, ‘‘इतनी जल्दी आ गये।‘‘
‘‘हां, क्यों?’’ विनोद ने पूछा।
सविता के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी और उसकी भयभीत आंखें नीचे झुकी हुयी थी और तभी विनोद को कमरे के अन्दर आहट सुनाई दी, तो उसने पूछा, ‘‘अंदर कौन है?’’
सविता ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो विनोद का मन आशंका से भर गया। उसने सविता को धकेल कर एक ओर किया और कमरे के अन्दर दाखिल हो गया। अन्दर कदम रखते ही सामने का दृश्य देखकर उसके बदन में आग लग गई। उनका नौकर मस्तराम पलंग के नीचे छुपने का प्रयास कर रहा था। विनोद उसे देखकर चीखा, ‘‘निकल बाहर। तू तो आस्तीन का सांप निकला।’’
मस्तराम उठकर खड़ा हो गया। विनोद ने लात घंूसो से उसे पीटा फिर वह भाग गया। सविता अभी तक पकडे़ गये चोर की तरह मुंह लटकाए खड़ी थी। विनोद का पूरा शरीर गुस्से से जल रहा था। उसने नफरत से पत्नी की ओर देखा ओर फिर चोटी पकड़ कर उसे जमीन पर पटक दिया। फिर उसे भी लात घूसों से बेतहाशा पीटने लगा। उसने सविता को तभी छोड़ा, जब वह उसे मारते-मारते थक गया।

इस घटना के बाद विनोद ने अपने घर में मस्तराम के आने पर प्रतिबंध लगा दिया तथा नौकरी से भी निकाल दिया। मस्तराम, सविता से मिलने कई दिनों तक नहीं आया। किन्तु वह सविता की मोहब्बत के कारण दिल से मजबूर था।
उसकी आंखें सविता को देखने के लिए तरसने लगी और दिल बेचैन रहने लगा। जो हाल मस्तराम का था, वही सविता का भी था। वह भी मस्तराम के बिना जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी।
इधर विनोद ने मस्तराम को नौकरी से निकाल दिया, तो उसका धंधा चैपट हो गया। आटा की सप्लाई रुकी, तो फुटकर दूकानदारों ने पैमेन्ट रोक लिया। विनोद चक्की चलाने वाले नौकर की खोज कर रहा था, लेकिन कोई मिल नहीं रहा था।
इसी बीच मस्तराम अपना वेतन मांगने विनोद के पास पहुंचा। विनोद का नरम रुख देखकर मस्तराम ने माफी मांगी और पुनः काम पर रखने का आग्रह किया। विनोद को भी नौकर की सख्त जरुरत थी, सो न चाहते हुए भी उसने मस्तराम को नौकरी पर रख लिया।
मस्तराम नौकरी करने लगा, तो उसके चंचल मन में सविता को पाने की चाहत फिर से जाग उठी। एक रोज जब विनोद गेहूं खरीदने झीझक मण्डी गया, तो उचित मौका देखकर मस्तराम, सविता के पास पहुंच गया।
मस्तराम को देखते ही सविता की आंखें डबडबा आईं। वह आवेश में आकर मस्तराम से लिपट गयी। फिर उसने कहा, ‘‘मस्तराम, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। शराब के नशे में विनोद आदमी से राक्षस बन जाता है और ताने देकर बुरी तरह पीटता है।’’
मस्तराम ने सविता को सांत्वना देते हुए समझाया, ‘‘भैया ने मुझे माफ कर दिया है। अब सब ठीक हो जायेगा।’’
इसके बाद मस्तराम और सविता का शारीरिक मिलन पुनः होने लगा। लेकिन अब दोनों बेहद सतक्र्रता बरतने लगे। पर एक दिन सतर्कता के बावजूद पड़ोसी कृष्ण गोपाल की पत्नी रोशनी ने मस्तराम को सविता के साथ आंगन में अश्लील हरकत करते देख लिया। उसने यह बात अपने पति कृष्ण गोपाल को बताई। फिर कृष्ण गोपाल ने विनोद को चेताया।
विनोद ने इस बावत से पूछताछ की तो वह साफ मुकर गयी। इस पर विनोद को गुस्सा आ गया और वह सविता को पीटने लगा। सविता पिटने से बचने के लिए त्रिया चरित्रा करने लगी और बोली, ‘‘मुझे क्यों पीटते हो? पीटना ही है, तो उस रोजश को पीटो, जो जबरन मेरे जिस्म से खेलकर चला जाता है।’’ वह मगरमछ के आंसू बहाते हुए बोली, ‘‘मैं लाख मना करती हूं, परन्तु वह अपनी हवस मिटाने के बाद ही छोड़ता है। मैं चीखने की कोशिश करती हूं, तो तुम्हें जान से मारने की धमकी देता है। तब मैं बेबस हो जाती हूं।’’
सविता की बात सुनकर विनोद का हाथ जहां का तहां रुक गया। फिर कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘यदि ऐसी बात थी, तो तूने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’’

‘‘कैसे बताती, तुम्हारा धंधा बन्द नहीं हो जाता। तुम्हें याद नहीं, पिछली बार जब तुमने उसे निकाल दिया था, तब धंधा मंदा पड़ गया था। तभी तो तुमने दोबारा उसे नौकरी पर रखा था।’’
‘‘अरे धंधा जाये भाड़ में। एक बार उस दो टके के नौकर मस्तराम को माफ कर दिया था, तो क्या बार-बार थोडे़ ही माफ कर दूंगा।’’ वह आंखों से अंगारे बरसाता हुआ बोला, ‘‘अब तो मैं उसे सबक सिखा कर ही रहूंगा, लेकिन…?’’
‘‘लेकिन क्या?’’ सविता ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या सोचा है तुमने?’’
‘‘मैंने जो भी सोचा है, उसमें तुम्हें मेरा साथ देना होगा।’’ विनोद ने सख्त भाव से पूछा, ‘‘दोगी न मेरा साथ?’’
‘‘म… मु… मझे क्या करना होगा?’’ सविता ने थूक निगलते हुए पूछा।
‘‘उसे घर बुलाना होगा। फिर हम दोनों मिलकर उसको सदा के लिए शांत कर देंगे।’’ गंभीर होकर बोला विनोद।
‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती। यह तो पाप है।’’ सविता घबरा कर बोली।
‘‘जब तुम उस कमीने के साथ रंगरेलिया मनाती थी, तब पाप नहीं था और अब पाप-पुण्य समझा रही है।’’
कुछ देर ना नुकुर के बाद सविता, पति का साथ देने को तैयार हो गयी। उसके बाप विनोद व सविता ने मस्तराम की हत्या की योजना बनायी।
इस योजना की जानकारी सविता ने मस्तराम को नहीं दी और पहले जैसा प्यार दर्शाती रही। मस्तराम को जरा भी आभास नहीं हुआ, कि उसकी मौत का ताना-बाना बुना जा चुका है।
योजना के तहत एक शाम मस्तराम ने दुकान बन्द की और चाभी विनोद को देकर घर के लिये रवाना हुआ। अभी उसने कस्बा पार ही किया था, कि मोबाईल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नजर डाली, तो नम्बर सविता का था। उसने मोबाईल रिसीविंग वाला बटन दबाया और बोला, ‘‘हां भाभी कहिए, सब ठीक तो है?’’
‘‘तुम्हारे बिना सब ठीक कैसे हो सकता है?’’ मादक स्वर में बोली सविता, ‘‘तुम्हारी याद सता रही है। जल्दी अपनी सविता के पास चले आओ।’’
‘‘ठीक है भाभी, मैं चन्द मिनटों में आता हूं।’’ मन ही मन सविता के गुदाज बदन को पाने की खुशी में चहक रहा था मस्तराम, ‘‘हाय! क्या मजा आयेगा, जब सविता भाभी के वस्त्रा उतार कर उसकी देह में समाऊंगा।’’
कुछ देर बाद ही मस्तराम सविता के घर आ गया। आते ही उसने सविता को बाहों मंे भरा तो सविता छिटक कर दूर हो गयी और बोली, ‘‘मस्तराम, अब तक तुम जबर्दस्ती करते रहे लेकिन अब नहीं कर पाओगे। मुझे हाथ लगाया तो पछताओगे।’’
‘‘यह तुम क्या कह रही हो भाभी!’’ हैरत से बोला मस्तराम, ‘‘मंैने कभी जबर्दस्ती नहीं की, जो मिलन हुआ तुम्हारी मर्जी से हुआ।’’
कहते हुए मस्तराम ने ज्यांे ही सविता को दोबारा बाहों में भरा त्यों ही सामने विनोद आ गया। मस्तराम को देखकर विनोद उस पर टूट पड़ा और डंडे से उसकी पिटाई करने लगा। मस्तराम दरवाजे की ओर भागा तो सविता सामने आ गयी। उसने कमरे की कंुडी अन्दर से बन्द कर ली।

मस्तराम पिटते हुए जमीन पर गिर पड़ा। मस्तराम हाथ पैर चलाने लगा तो सविता ने उसके पैरों को दबोच लिया और विनोद ने गला कस दिया। फिर कुछ देर बाद ही मस्तराम की सांसे थम गयी। हत्या करने के बाद विनोद ने शव को बोरी में भरा और साइकिल से रखकर कस्बा के बाहर तालाब किनारे फेंक आया।
इधर जब देर रात तक मस्तराम घर नहीं पहुंचा, तो उसके पिता रतन गुप्ता को चिंता हुयी। उसने फोन मिलाया, तो मस्तराम व उसके मालिक विनोद का स्विच आॅफ था। सुबह वह सहायल कस्बा को रवाना हुए, तो कस्बा के बाहर तालाब पर भीड़ जुटी थी। वह वहां पहुंचे, तो मस्तराम के शव की शिनाख्त की और पुलिस में सूचना दी।
सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहंुंची और शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू की। जांच में अवैध रिश्तो में हुयी हत्या का पर्दा फाश हुआ।

कहानी लेखक की कल्पना पर आधारित है व इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह केवल संयोग मात्र हो सकता है।

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