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कच्ची उम्र की आशिक Antarvasna Vasna Kahani

कच्ची उम्र की आशिक Antarvasna Vasna Kahani

लेकिन सुनयना चिंतित व उदास थी। कुछ ही देर में बिरादरी की पंचायत बैठने वाली थी और इसमें उनके प्यार के भविष्य का फैसला होना था। शरद, सुनयना की महकती जवानी की खूबशू पी रहा था और सुनयना चुपचाप शरद को सहयोग कर रही थी।

सांद्री के गंगाधर की बेटी सुनयना काफी सुंदर, आकर्षक व हंसमुख मासूम-सी युवती थी। वह हाई स्कूल में पढ़ती थी। जिस स्कूल में सुनयना पढ़ती थी, उसी स्कूल के ग्राउण्ड में रतभोखा हाई स्कूल के चपड़ासी गणपत का बेटा श्रवण रहता था। श्रवण का पूरा नाम शरद शर्मा था।
सुनयना फुर्सत के क्षणों में गणपत के घर आ जाया करती थी। गणपत, सुनयना ही नहीं, स्कूल की सारी लड़कियों को प्यार करता था तथा उन्हें कुछ न कुछ देता रहता था। कभी किसी लड़की को टाॅफी, तो कभी अपने हाथ का बनाया खाना ही खिलाकर भेजता था। यूं तो लड़कियां गणपत के घर पानी पीने आती थीं, लेकिन इसी बहाने से वे वहां बैठकर थोड़ी गपशप कर लेती थीं।
18 साल का श्रवण उर्फ शरद शर्मा अपने पिता के साथ स्कूल परिसर में ही रहता था। वह खूब लंबा-छरहरा व कसरती जिस्म वाला आकर्षक युवक था। श्रवण आई.ए. में था और हर समय वह अपने घर में ही रहकर पढ़ाई करता था। उसके घर पर पानी-पीने आई लड़कियां अक्सर श्रवण से चुहल करती रहती थीं।
यूं तो कई लड़कियां श्रवण के आगे-पीछे डोलती रहती थीं, पर उनमें सुनयना की बात ही कुछ अलग थी। सुनयना हर समय श्रवण के गिर्द ही मंडराती रहती थी।
श्रवण मैथ्स(गणित) में काफी तेज था। सुनयना अक्सर मैथ्स के कोई सवाल लेकर श्रवण के पास आ जाती थी और श्रवण चुटकियों में प्रश्न का हल कर देता था। इस दरम्यान दोनों में आंखों से तथा कभी जुबान से भी बातें होती रहती थीं।
इसी मिलने-जुलने के क्रम में सुनयना कब श्रवण को अपना दिल दे बैठी, कुछ पता ही नहीं चला। श्रवण को इसका एहसास उस रोज हुआ, जब सुनयना ने अपनी नोट्स बुक में श्रवण को संबोधित करते हुए एक चिट तैयार किया था। श्रवण ने उस चिट में पढ़ा था।

 

सुनयना ने लिखा था, ‘‘श्रवण, मैं तुमसे प्यार करने लगी हूं। मेरे मन मंदिर में शरद है, तो दिल में श्रवण है और इसके अलावा मैं कुछ और सोच ही नहीं पाती। अगर किसी दिन तुम्हें देख व मिल नहीं पाती, तो भगवान ही गवाह है शरद, मैं चैन से सो नहीं पाती हूं। मुझे तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा।’’
श्रवण, सुनयना से प्यार करता था या नहीं? पता नहीं, लेकिन यह सच था, कि सुनयना उसे अच्छी लगती थी। उसका हंसना-मुस्कराना, इठला कर बातें करना व श्रवण को चिढ़ाते हुए बुकिस वर्म कहने की उसकी इच्छाएं काफी निराली थीं। इसी एहसास के साथ श्रवण, सुनयना की तरफ आकर्षित होता गया।

और जब सुनयना ने खुलेआम प्यार का इजहार कर दिया, तो श्रवण ने भी उसका उत्तर तैयार करने में देरी नहीं लगाई। अगले दिन सुनयना किसी बहाने से श्रवण से मिलने आई, तो श्रवण ने अचानक ही सुनयना को बांहों में भर लिया तथा उसके अधरों तथा गालों का चुम्बन लेेते हुए कहा, ‘‘सुनयना, आई लव यू! कई दिनों से मेरे सपने में एक लड़की की तस्वीर उभर रही थी, वो तुम हो सुनयना तुम।’’
दोनों ओर से मोहब्बत का इजहार हुआ, तो इसके बाद दोनांे प्रेमियों ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उस रोज स्कूल की छुट्टी होने पर सुनयना घर जाने के लिए बाहर आयी, तो श्रवण ने उसे इशारे से अपने घर में बुला लिया और कहा, ‘‘सुनयना जब हम दोनों एक-दूसरे को इतना चाहते हैं, तो हमारे बीच कोई फासला नहीं रहना चाहिए। आज मौका अच्छा है।’’ उसने बताया, ‘‘पापा शहर गए हैं और मैं अकेला हूं। तुम थोड़ी देर मेरे पास बैठी रहो, मैं तुम्हारे हुस्न का कतरा-कतरा पीना चाहता हूं।’’
यह कहकर श्रवण ने अंदर से कोठरी का दरवाजा बंद किया और सुनयना को प्यार करने लगा। जब श्रवण ने सुनयना के बदन को चूमना शुरू किया, तो सुनयना के बदन में एक सनसनी-सी दौड़ गयी। वह भी एक पल के लिए श्रवण से लिपट गयी और उसने भी श्रवण को चूमना शुरू कर दिया। परस्पर चुम्बन, आलिंगन के बाद दोनों निर्वस्त्रा होते गए। फिर एक ऐसा अवसर ऐसा भी आया, जब दोनों ही एक-दूसरे के समक्ष पूर्ण निर्वस्त्रावस्था में हो गए।

सुनयना का तो मारे शर्म के बुरा हाल था, मगर श्रवण, सुनयना को इस अवस्था में देखकर पागल हुआ जा रहा था। उसके बदन में गजब की एंेठन होने लगी। वह सुनयना के नजदीक आया और उसकी आंखों से आंखें मिला कर बोला, ‘‘तुम तो बहुत ही खूबसूरत हो सुनयना।’’ वह प्यार भरी निगाहों से देखते हुए बोला, ‘‘मैंने तो आज तक तुम्हारा बाहरी सौंदर्य ही देखा था, मगर आज तुम्हें इस रूप में देखकर, तो मैं दीवाना हुआ जा रहा हूं।’’
कहकर श्रवण ने झट से सुनयना के गोरे निर्वस्त्रा बदन को अपनी बांहों में समेट लिया और दीवानों की तरह उसे यहां-वहां चूमने व चाटने लगा। फिर जैसे ही उसके हाथ सुनयना के सख्त उभारों पर जम गए, तो सुनयना भी सिहर उठी। उसके मुख से मादक सिसकारियां निकलने लगीं।

 

‘‘ओह! श्रवण।’’ वह आंखें मूंदती हुई बोली, ‘‘क्या करते हो छोड़ो न।’’ वह जानबूझ कर बनावटी विरोध करती हुई बोली, ‘‘प्लीज़ छोड़ दो… अब मैं भी बहकने लगी हूं। अगर मैं बहक गई, तो कुछ न कुछ हो जाएगा।’’

कच्ची उम्र की आशिक Antarvasna Vasna Kahani

कच्ची उम्र की आशिक Antarvasna Vasna Kahani

‘‘यही तो मैं चाहता हूं मेरी जान, कि कुछ न कुछ हो जाए।’’ वह सुनयना के पुष्ट नितम्बों पर हाथ फिराता हुआ बोला, ‘‘आज तुम मुझे नहीं रोकोगी।’’ सुनयना के होंठों को चूमते हुए बोला श्रवण, ‘‘आज हम दोनों सारी मर्यादा तोड़ दंेगे।’’
अब तक सुनयना का बनावटी विरोध भी काफूर हो चुका था। वह भी मादक सीत्कार लेकर बोली, ‘‘मुझसे भी अब और नहीं सहा जा रहा मेरे श्रवण।’’ बेतहाशा लिपट गयी सुनयना, श्रवण से, ‘‘आज मैं इस सुख को पा लेना चाहती हूं, जिसे मैंने शादी के बाद अपने पति से चाहने की कामना की थी।’’
फिर क्या था, श्रवण ने सुनयना को गोद में उठाया और पास ही पड़े बेड पर ले जाकर पटक दिया। वह उसके ऊपर झुक कर बोला, ‘‘मेरा पूरा साथ देना मेरी जान।’’ वह बोला, ‘‘थोड़ी तकलीफ होगी, मगर वायदा करता हूं, मजा भी उतना ही दूंगा, कि तुम मेरी कायल हो जाओगी।’’
‘‘हंू…।’’ केवल इतना ही कहा सुनयना और अपनी पलकें झुका लीं।
फिर श्रवण एक जोरदार प्रहार के साथ सुनयना की ‘देह’ में समा गया। एकदम बिलबिला उठी सुनयना। वह दोनों जबडे़ भींचते हुए बोली, ‘‘उई मा! मर गयी।’’ वह श्रवण को परे धकेलने लगी, ‘‘हट जाओ प्लीज श्रवण…. ओह! रहने दो… मर गयी…।’’
‘‘श्..श्..!’’ श्रवण ने सुनयना के मुंह पर अंगुलि रखते हुए, ‘‘चीखो मत, कोई सुन लेगा।’’ वह हौले से बोला, ‘‘मैंने पहले ही कहा था, कि थोड़ी तकलीफ होगी।’’ फिर उसके उरोजों को धीरे-धीरे सहलाते हुए बोला, ‘‘थोड़ा और धैर्य रख लो, फिर देखना तुम्हें भी जन्नत का मजा आने लगेगा।’’
फिर सुनयना के किसी तरह थोड़ी देर तक श्रवण के वार सहन किए, परन्तु वाकई कुछ ही देर बाद उसे भी सुख की अनुभूति होने लगी। उसका दर्द जाता रहा था। वह हौले से मुस्करा के बोली, ‘‘जानू अब तो वाकई मजा आ रहा है।’’ वह शरमाते हुए बोली, ‘‘थोड़ी रफ्तार बढ़ाओ ना प्यार की।’’
कहते ही वह शर्म के मारे श्रवण से लिपट गयी। फिर श्रवण ने जमकर सुनयना के जिस्म की सवारी की। फिर एक क्षण आया, जब दोनों एक उत्तेजक सीत्कार लेते हुए बेतहाशा एक-दूसरे से लिपट गए और बुरी तरह हांफने लगे दरअसल दोनों ही पूर्ण तृप्त हो चुके थे। दोनों को आज असीम सुख की अनुभूति प्राप्त हुई थी। एक ऐसा तूफान उस बंद कमरे में आया था, जो उन दोनों को सराबोर करते हुए निकल गया। आज श्रवण व सुनयना ने आपस की जिस्म की दूरियां भी मिटा ली थीं।
कहते हैं, कि कच्ची उम्र में प्यार का नशा बड़ा गुल खिलाता है। यह अंधा व बहरा भी होता है तथा इंसान के विवेक को हर लेता है। श्रवण व सुनयना ने सोचा तक नहीं था, कि केवल जिस्म की दूरियां मिटा लेने से ही सारी दूरियां मिटा नहीं जातीं। सबसे बड़ा फासला समाज व बिरादरी का होता है, जिसकी बुनियाद पर दोनों दो अलग-अलग किनारों पर खड़े थे।

लेकिन यह तो तब ही जान पाते, जब उनके प्यार का नशा कुछ कम होता। सोच-विचार, विवेक, समाज, मर्यादा, परिवार सबको ताक पर रख दिया प्रेमी युगल ने और एक नई राह पर चल पड़े, जहां उन दोनों के सिवा कोई नहीं था। न घर वाले, न पड़ोसी, न मित्रा, न रिश्तेदार। यही दुनिया थी, इस प्रेमी जोड़े की।
कहानी लेखक की कल्पना मात्र पर आधारित है व इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह केवल संयोग मात्र हो सकता है।

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